कल्पना कीजिए की आप सुबह उठते ही सोशल मीडिया खोलते हैं। अचानक आपकोएक मशहूर व्यक्ति की तस्वीर दिखती है जिससे वे किसी विवादास्पद स्थिति में दिखाई दें रहें हो। आप तुरंत उसे बिना जानकारी निकाले शेयर कर देते हैं। कुछ घण्टों के बाद पता चलता हैं कि वो तस्वीर नकली थी, आप के द्वारा बनाई गई तस्वीर हैं। अब जरा सोचिए- उस एक गलत शेयर ने कितने लोंगो को भ्रमित कर दिया। आज हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ तस्वीरें और वीडियो सिर्फ यादें संजोने का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी सोच, भावनाएँ और विश्वास बनाने वाले साधन बन चुके हैं। सुबह की पहली न्यूज से लेकर रात को स्क्रॉल की जाने वाली सोशल मीडिया पोस्ट तक, हर जगह हमें दृश्य सामग्री घेर लेती है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या हम जो देख रहे हैं, वह वास्तव में सच है?
तकनीक के विकास ने फोटो और वीडियो को बदलना बेहद आसान बना दिया है। अब सिर्फ कुछ सेकंड्स में कोई भी साधारण तस्वीर को पूरी तरह बदल सकता है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस , मशीन लर्निंग और एडवांस्ड एडिटिंग टूल्स ने “रियलिटी” और “फेक” के बीच की रेखा को धुंधला कर दिया है। यही कारण है कि “हर तस्वीर सच नहीं होती” आज एक गंभीर सामाजिक चेतावनी बन गई है।
इस ब्लॉग में हम विस्तार से समझेंगे कि फोटो, वीडियो एडिटिंग से समाज पर क्या-क्या बुरे प्रभाव पड़ सकते हैं, यह क्यों चिंता का विषय है और हम इससे बचाव के लिए क्या कर सकते हैं।
सबसे बड़ा खतरा फेक फोटो और एडिटेड वीडियो से झूठी खबरें फैलाने का है। जो भी देखता हे भ्रमित होंता हैं। उदाहरण के लिए, किसी राजनीतिक रैली की तस्वीर को एडिट करके ऐसा दिखाना कि वहाँ भारी भीड़ थी या बिल्कुल भीड़ नहीं थी, इससे लोगों की राय पर असर पड़ सकता है। प्राकृतिक आपदाओं या युद्ध जैसी घटनाओं में झूठी तस्वीरें साझा करने से अफरा-तफरी और डर फैलता है। इसका प्रभाव समाज में भ्रम पैदा होता है, लोकतांत्रिक प्रक्रियाएँ प्रभावित हो सकती हैं, लोग सच्चाई और झूठ में अंतर नहीं कर पाते।
किसी की निजी तस्वीर को एडिट करके सोशल मीडिया पर फैलाना बेहद खतरनाक हो सकता है। कई बार मशहूर हस्तियों या नेताओं की फेक तस्वीरें बनाकर उनकी छवि खराब करने की कोशिश की जाती है। आम नागरिक भी इसका शिकार होते हैं। स्कूल व कॉलेज के छात्रों की तस्वीरें बदलकर मजाक उड़ाया जाता है। इससे व्यक्ति का आत्मविश्वास टूट सकता है, करियर और निजी जीवन बर्बाद हो सकता है, समाज में नफरत और अविश्वास फैल सकता है।
आज के युवा और किशोर सबसे ज्यादा सोशल मीडिया पर सक्रिय रहते हैं। वे फोटो और वीडियो शेयर करते हैं, लेकिन कई बार उनके साथियों द्वारा एडिट की गई तस्वीरें उन्हें परेशान कर देती हैं। किसी की फोटो को बदलकर उसका मजाक उड़ाना साइबर बुलिंग का हिस्सा है। लगातार ऐसी हरकतें देखने से पीड़ित व्यक्ति डिप्रेशन, एंग्जायटी और आत्मग्लानि का शिकार हो सकता है। ये बच्चों और युवाओं का मानसिक स्वास्थ्य खराब होता है, आत्महत्या जैसे गंभीर कदम उठाने की नौबत आ सकती है।
जब लोग बार-बार नकली और एडिटेड तस्वीरें देखते हैं, तो असली तस्वीरों और खबरों पर भी भरोसा करना मुश्किल हो जाता है। पत्रकारिता में इसका बहुत बड़ा असर पड़ता है। अगर न्यूज चैनल या अखबार की फोटो फेक साबित हो जाए, तो उसकी विश्वसनीयता खत्म हो सकती है, समाज में “सब कुछ झूठ है”
वाली सोच विकसित होती है। जिसका दुष्परिणाम लोकतंत्र, मीडिया और न्यायपालिका जैसी संस्थाओं पर से भरोसा उठ सकता है, समाज में नकारात्मकता और संदेह बढ़ सकता है।
फोटो एडिटिंग ऐप्स और फिल्टर्स के कारण आज की पीढ़ी “परफेक्ट लुक्स” की दीवानी हो गई है। सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली खूबसूरती कई बार असली नहीं होती। युवा अपने चेहरे या शरीर की तुलना इन एडिटेड फोटो से करने लगते हैं। जो की गलत हैं। आज की पीढ़ी अपने लुक्स को लेकर असंतोष होती जा रही हैं। प्लास्टिक सर्जरी या खतरनाक डाइटिंग जैसे जोखिम भरे कदम उठाने पर मजबूर हो रही हैं, हमारी आने वाली पीढ़ी के लिए ओर भी खतरनाक होते जा रहा हैं।
भारत समेत कई देशों में “मॉर्फ्ड” फोटो बनाना और बिना अनुमति किसी की तस्वीर बदलकर साझा करना अपराध की श्रेणी में आता है। आईटी एक्ट और साइबर कानून इस पर रोक लगाते हैं। दोषी पाए जाने पर सजा और जुर्माना भी हो सकता है। नैतिक दृष्टि से किसी की निजी छवि से छेड़छाड़ करना गलत है।
समाज में दूसरों की इज्जत करना हमारी जिम्मेदारी है।
शैक्षणिक वातावरण में भी एडिटेड फोटो और गलत जानकारी का असर गहराई से देखा जा रहा है। छात्र कई बार प्रोजेक्ट्स और रिसर्च में असली डेटा की बजाय फेक विजुअल्स का इस्तेमाल करते हैं। इससे उनकी समझ और सीखने की क्षमता पर नकारात्मक असर पड़ता है।
1. व्यक्तिगत स्तर पर किसी भी फोटो को शेयर करने से पहले उसका स्रोत जांचें। नई पीढ़ी को डिजिटल साक्षरता सिखाएँ। बच्चों और युवाओं से खुलेपन के साथ बातचीत करें कि असली और नकली तस्वीर में कैसे फर्क करें।
2. सामाजिक स्तर पर स्कूल और कॉलेजों में मीडिया लिटरेसी को पढ़ाई का हिस्सा बनाना चाहिए। जागरूकता कैंपेन चलाए जाने चाहिए ताकि लोग समझें कि एडिटेड तस्वीरों का अंधाधुंध इस्तेमाल खतरनाक हो सकता है।
3. तकनीकी स्तर पर सोशल मीडिया कंपनियों को ऐसी टेक्नोलॉजी विकसित करनी चाहिए जो फेक फोटो और वीडियो को पहचान सके। वॉटरमार्किंग और डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम का इस्तेमाल बढ़ाना चाहिए।
4. कानूनी स्तर पर साइबर अपराधों से जुड़े कानूनों को और सख्ती से लागू करना चाहिए। आम जनता को यह जानकारी दी जानी चाहिए कि फेक फोटो बनाने या फैलाने पर क्या सजा हो सकती है।
कई देशों में “फैक्ट-चेकिंग” संस्थाएँ लगातार फेक फोटो और खबरों का पर्दाफाश कर रही हैं। भारत में भी Alt News and BOOM जैसी फैक्ट-चेक वेबसाइट्स (Fact-Checking Organizations) जनता को जागरूक करने का काम कर रही हैं।
यदि हम सब इन प्लेटफॉर्म्स से जुड़े रहें और हर फोटो-खबर की जांच करें, तो समाज में गलत सूचना का प्रसार काफी हद तक रोका जा सकता है।
डिजिटल एडिटिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस हमारी दुनिया को बदल रहे हैं। इन तकनीकों के सकारात्मक उपयोग भी हैं दृ कला, शिक्षा, विज्ञान और मनोरंजन में यह बेहद उपयोगी हैं। लेकिन जब इनका गलत इस्तेमाल होता है, तो समाज पर गंभीर नकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं। हम सबकी जिम्मेदारी है कि हम डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल करते समय जागरूक रहें।
याद रखें
1) हर तस्वीर सच नहीं होती।
2) शेयर करने से पहले सोचें।
3) जागरूक बनें और दूसरों को भी जागरूक करें।
यदि हम सब मिलकर सही दिशा में कदम उठाएँ, तो यह तकनीक समाज को नुकसान पहुँचाने के बजाय एक बेहतर भविष्य बनाने में सहायक होगी।
Prof. Deepika Palle
(Assistant Professior)
Institute of Commerce
Sage University Indore